भारत 30 साल से कॉन्ट्रैक्ट में उलझा, पाकिस्तान को मिली चीन की एडवांस पनडुब्बी – समुद्री ताकत का बदलता संतुलन
नई दिल्ली/इस्लामाबाद/बीजिंग: दक्षिण एशिया में समुद्री ताकत का संतुलन तेजी से बदलता नजर आ रहा है। चीन ने 30 अप्रैल को पाकिस्तान नौसेना को हैंगोर क्लास की एडवांस पनडुब्बी सौंप दी है। यह पनडुब्बी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) तकनीक से लैस है, जिससे यह लंबे समय तक पानी के भीतर रहकर ऑपरेशन कर सकती है।
यह डील कुल 8 पनडुब्बियों की है, जिसमें से 4 का निर्माण चीन में किया जा रहा है, जबकि बाकी 4 पाकिस्तान में ही बनाई जाएंगी। इस प्रोजेक्ट के जरिए चीन पाकिस्तान को सिर्फ पनडुब्बियां ही नहीं दे रहा, बल्कि उसे तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञ इस पूरे प्रोजेक्ट की तुलना पाकिस्तान के JF-17 फाइटर जेट प्रोग्राम से कर रहे हैं, जहां चीन ने तकनीक ट्रांसफर कर पाकिस्तान में उत्पादन क्षमता विकसित की थी। अब इसी मॉडल को पनडुब्बी निर्माण में भी लागू किया जा रहा है।
पाकिस्तान को क्या मिलेगा फायदा?
- आधुनिक तकनीक से लैस पनडुब्बियां
- नौसेना की अंडरवाटर युद्ध क्षमता में बढ़ोतरी
- AIP तकनीक से लंबे समय तक पानी में रहने की क्षमता
- भविष्य में खुद पनडुब्बी निर्माण की क्षमता
भारत की स्थिति: Project 75-I अब भी लंबित
दूसरी ओर भारत का बहुप्रतीक्षित Project 75-I अभी तक फाइनल नहीं हो सका है। इस प्रोजेक्ट के तहत भारतीय नौसेना के लिए 6 एडवांस पनडुब्बियों का निर्माण किया जाना है।
इस प्रोजेक्ट में जर्मनी की कंपनी Thyssenkrupp Marine Systems (TKMS) और भारत की Mazagon Dock Shipbuilders Limited (MDL) के बीच साझेदारी की योजना है। प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 8 से 10 अरब डॉलर के बीच बताई जा रही है, लेकिन लंबे समय से यह योजना कॉन्ट्रैक्ट स्टेज में ही अटकी हुई है।
जबलपुर बरगी डैम हादसा: मां-बेटे की दर्दनाक मौत, 43 में से 28 बचाए गए
रणनीतिक असर
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के लिए नई चुनौती पैदा कर सकता है। एक तरफ चीन तेजी से अपने सहयोगियों को उन्नत सैन्य तकनीक दे रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत के कुछ अहम रक्षा प्रोजेक्ट्स में देरी चिंता का विषय बनी हुई है।
निष्कर्ष
चीन द्वारा पाकिस्तान को हैंगोर क्लास पनडुब्बी सौंपना सिर्फ एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव का संकेत है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि भारत अपने लंबित प्रोजेक्ट्स को कितनी तेजी से आगे बढ़ाता है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें