प्राचीन भारत के ऐतिहासिक स्रोत
भारत का नामकरण
अपने देश के लिए हमलोग प्रायः इंडिया अथवा भारत जैसे नामो का प्रयोग करते है |इंडिया शब्द इंडस से निकला है जिसका संस्कृत भाषा में अर्थ है सिंधु |भारत वर्ष नाम सर्वप्रथम पाणिनि की अष्टाध्यायी में उल्लिखित है |खारवेल के हाथी गुम्फा अभिलेख में भी भारतवर्ष का उल्लेख है | भारत देश का यह नामकरण ऋग्वैदिक काल के प्रमुख जन के नाम पर किया गया है | एक अन्य मान्यता के अनुसार देश का यह नाम प्रथम जैन तीर्थकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम पर किया गया है |ब्राह्मण ग्रंथो के अनुसार इस देश का नामकरण कुरु वंस के प्रतापी सम्राट दुस्यंत एवं शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर किया गया था | आर्यो के निवास स्थान होने के कारण इसका नामकरण आर्यावर्त भी कहा जाता है |भारत को जम्बूद्वीप का एक भाग भी माना जाता है |प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने का स्रोत |
प्राचीन भारतीय इतिहास को जानने के स्रोतों के लिए इसे तीन भागो में बांटा गया है |
(1) पुरातात्विक स्रोत (2) साहित्यिक स्रोत
(3) विदेशी स्रोत
(1) पुरातात्विक स्रोत -
पुरातात्विक स्रोत प्राचीन भारत को जानने का सर्वाधिक सक्षम और विश्वशनीय साधन माना जाता है | इसके अंतर्गत अभिलेख , सिक्के , स्मारक , भवन , चित्रकला , मूर्तियां , इत्यादि आता है |ऐसी वस्तुओ को अध्यन करनेवाला व्यक्ति पुरातत्वविद कहलाता है |
अभिलेख - पथरो , स्तम्भों ,धातु की पट्टियाँ या मृदभांडों पर उत्कीर्ण प्राचीन विवरण को अभिलेख कहा जाता है |अभिलेखों के अध्यन को पुरालेखशास्त्र और इसकी तथा पुराने दस्तावेजों की प्राचीन लिपि के अध्यन को पुरालिपिशास्त्र कहा जाता है | अभिलेख ,मुहरों , स्तूपों , प्रस्तर स्तम्भों ,चट्टानों ,ताम्रपत्रों , मुर्तिओ , मंदिर की दीवारों और ईंटो पर प्राप्त होते है |अभिलेखों की भाषा प्राकृत ,पाली , संस्कृत , तथा अन्य दक्षिण भाषाएँ है | कुछ अभिलेख द्विभाषी तथा विदेशी भाषा में भी उत्कीर्ण है | ,सबसे पुराने अभिलेख हड़प्पा सभ्यता की मुहरों पर मिलती है जो लगभग 2500 ई. पू .के है लेकिन इसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है |भारत से बाहर सर्वाधिक प्राचीनतम अभिलेख पक्षिम एशिया या एशिया माइनर के बोंगजकोई नामक स्थान से लगभग 1400 ई.पू.के मिले है जिसमे इंद्र , मित्र , वरुण , और नासत्य ( अश्विनी कुमार ) नामक वैदिक देवताओ के नाम मिलता है |ईरान से प्राप्त नक्स - ए - रुस्तम अभिलेख से प्राचीन भारत के पक्षिम एशिया से संम्बंधो की जानकारी मिलती है |
, ईरान से प्राप्त कस्साईट अभिलेख तथा सीरिया से प्राप्त मितन्नी अभिलेख में आर्य नामो का उल्लेख मिलता है |सर्वप्रथम 1837 ई. में जेम्स प्रिन्सेप को ब्राह्मी लिपि में लिखित मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेख को पढ़ने में सफलता मिली है |
अशोक के अभिलेख के आलावा भी भारत के अन्य प्रमुख अभिलेख है - खारवेल का हाथीगुम्फा अभिलेख , सातवाहन नरेश गौतमी पुत्र शातकर्णि का नासिकगुहा अभिलेख , शक्क्षत्रप रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख , समुद्रगुप्त का प्रयाग सतम्भ अभिलेख , स्कंदगुप्त का भीतरी तथा जूनागढ़ अभिलेख ,यशोवर्मन का मंदसौर अभिलेख , पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख , प्रतिहार शासक भोज का ग्वालियर अभिलेख , विजयसेन का देवपाड़ा अभिलेख इत्यादि |आरंभिक अभिलेख प्राकृत भाषा में लिखी गई थी |
अभिलेखों में संस्कृत भाषा का प्रयोग ईसा की दूसरी सदी में मिलती है शक शासक रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख संस्कृत भाषा में लिखा पहला अभिलेख है
सिक्के - सिक्कों के अध्यन को मुद्राशास्त्र कहा जाता है |प्राचीन सिक्के सोना , चांदी , काँसा , ताँबा , सीसा और पोटीन के बने हुए मिले है | भारत के प्राचीन सिक्को पर केवल चिन्ह उत्कृण है |इसके ऊपर कोई लेख नहीं है जिसे आहत सिक्के कहा जाता है इसे पंचमार्क्ड सिक्के भी कहा जाता है |जो ई. पू. पाँचवी सदी के है |इसके बाद के सिक्को पर तिथियां , राजाओ , एवं देवताओ के नाम अंकित होने लगे |आहत सिक्के की सबसे निधियां पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा मगध से प्राप्त हुई है |
हिन्द - यवनो ने भारत में सिक्का निर्माण की डाई विधि का प्रचलन किया |
सर्वप्रथम हिन्द - यूनानियों ने ही स्वर्ण मुद्राएं जारी की थी | सर्वाधिक शुद्ध - स्वर्ण मुद्राएँ कुषाणों ने तथा सबसे अधिक स्वर्ण मुद्राएँ गुप्तो ने जारी की | सातवाहनों ने सीसे की सिक्का जारी की थी | , अन्य पुरातात्विक साधन - अभिलेखों एवं सिक्को के आलावा प्राचीन भारत के विविध पहलुओं की जानकारी प्राप्त होती है |
(a) महलों एवं मंदिरो तथा उसके अवशेषों की प्राप्ति से वास्तुकला के विकास के साथ साथ सामाजिक , आर्थिक ,एवं धार्मिकअवस्था का भी आभास मिलता है |
(b) स्मारकों के दो भागो में बांटकर देखा जा सकता है - देशी तथा विदेशी |हड़प्पा ,नालंदा ,मोहनजोदड़ो ,हस्तिनापुर आदि देशी स्मारक है जबकि कम्बोडिया का अंकोरवाट मंदिर ,जावा का बोरोबुदुर मंदिर तथा बाली से प्राप्त मूर्तियां विदेशी स्मारक है |
( c ) मूर्तियाँ सांस्कृतिक एवं कला सम्बन्धी ऐतिहासिक स्रोत है जिससे सामान्य जनता की धार्मिक प्रवृतिओ तथा आस्था के बारे में पता चलता है |गान्धार कला तथा मथुरा कला मूर्ति कला की प्रमुख शैलियां थी |सारनाथ , बोधगया , भरहुत , अमरावती मूर्तिकला के अन्य प्रमुख केंद्र था |
( d ) मृदभांडों से भी कलात्मक प्रगति की जानकारी मिलती है |हड़प्पा काल के लाल मृदभांड , उत्तर वैदिक काल के चित्रित धूसर मृदभांड ,तथा मौर्य युग की पहचान उत्तरी काले पॉलीश वाले मृदभांडों से की जाती है |
(e) चित्रकला जीवन के विभिन्न पक्षों को स्पष्टता देने वाला प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत है |जिससे उस समय की जीवन की उन्नति एवं भावुकता का पता चलता है |
जैसे - भीमबेटका का जो मध्य प्रदेश में पड़ता है का गुफा चित्र एक मुख्य पुरातात्विक स्रोत है जिससे पूर्व ऐतिहासिक काल की सांस्कृतिक विविधता पर प्रकाश डालता है | अजन्ता के उन्नत गुफा चित्रों से गुप्त काल की उन्नत सांस्कृतिक दशा का पता चलता है
(2) साहित्यिक स्रोत -
अतीत की पुस्तकों हाथ से लिखी हुई थी जिसे पाण्डुलिपि कहा जाता है |ये पाण्डुलिपि भोजपत्र अथवा ताड़पत्रों पर लिखी हुई मिली है |
प्राचीन भारतीय साहित्य को दो भागो में बांटा गया है -
(a)धार्मिक साहित्य (b) धर्मेतर साहित्य
(a) धार्मिक साहित्य - धार्मिक साहित्य के अंतर्गत ब्राह्मण साहित्य ( हिन्दू धार्मिक साहित्य ) ,बौद्ध साहित्य ,एवं जैन साहित्य शामिल किया जाता है |,ब्राह्मण साहित्य - इसके अंतर्गत वेद , ब्राह्मण , आरण्यक , वेदांग , उपनिषद सूत्र साहित्य , स्मृतियाँ , पुराण , रामायण , तथा महाभारत ,आते है |ये सभी ग्रन्थ प्राचीन भारत की राजनितिक , धार्मिक , सामाजिक , आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते है |
सबसे प्राचीन ब्राह्मण साहित्य ऋग्वेद है |
वेद - भारत का सबसे प्राचीन धर्मग्रन्थ वेद है |
वेदों की संख्या चार है -
(a) ऋग्वेद (b) यजुर्वेद (c) सामवेद
( d) अथर्ववेद
इन चारो वेदों को सम्मलित रूप से संहिता कहा जाता है |ऋग्वेद को 1500 - 000 ई. पू के लगभग तथा यजुर्वेद ,सामवेद , अथर्ववेद को 1000 - 500 ई.पू.के लगभग माना जाता है |ऋग्वेद में मुख्यतः देवताओ की स्तुतियों का वर्णन है |यजुर्वेद में यज्ञो के नियम तथा विधि विधान का संकलन , सामवेद में यज्ञो के अवसर पर गए जाने वाले मंत्रो का संग्रह है |तथा अथर्ववेद में धर्म , औषधि प्रयोग , रोग निवारण , तंत्र - मन्त्र , जादू - टोना जैसे अनेक विषयो का वर्णन है |सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद है तथा सबसे अंतिम वेद अथर्वेद है |
ब्राह्मण ग्रन्थ - जितने भी वेद है सबका अलग अलग ब्राह्मण ग्रन्थ है जो गद्य में उल्लेखित है और कर्मकांड की पद्धति का उल्लेख करते है ब्राह्मण ग्रंथो की रचना ऋषिओ द्वारा की गई है | ऐतरेय , शतपथ आदि ब्राह्मण ग्रन्थ है | आरण्यक - जंगलो में लिखे गए ग्रंथो को आरण्यक कहा गया है|आरण्यक ग्रंथो की विषय - वस्तु आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चिंतन है |इसकी रचना ब्राह्मण ग्रंथो के बाद हुई है आरण्यक को विभिन्न वेदो से जोड़ा गया है |अथर्व वेद का कोई आरण्यक ग्रन्थ नहीं है |
वेदांग - वेदो का अर्थ ठीक प्रकार से समझने के लिए वेदांगो की रचना हुई है |
वेदांगो की संख्या छः है | ये है - शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , छंद ,तथा ज्योतिष |
उपनिषद - उपनिषद वैदिक ग्रंथो के अंतिम भाग है जिसमे अध्यात्म तथा दर्शन के गूढ़ रहस्य का विवेचन हुआ है |
वेदो का अतिम भाग होने के कारन इसे वेदांत भी कहा जाता है |
उपनिषदं की संख्या 108 है |
जिसमे वृहदारण्यक , कंठ , इत्यादि प्रमुख है |
सूत्र साहित्य - इसमें मनुष्यो के कर्तव्यों , वर्णाश्रम व्यवस्था एवं सामाजिक नियमो का उल्लेख किया गया है |
सूत्रों की संख्या तीन है - श्रोत सूत्र , गृह सूत्र , एवं धर्म सूत्र |
स्मृतियाँ - स्मृतियाँ की रचना सूत्रों के बाद हुई है |इसे धर्मशास्त्र भी कहा जाता है |मनुष्य की पुरे जीवन काल की विभिन्न क्रियाकलापों की जानकारी इन स्मृतिओं से मिलता है |
मनुस्मृति और यञवल्क्य स्मृति सबसे प्राचीन है |मनुस्मृति के सबसे प्रसिद्ध भाष्यकार मेघातथि , गोविंदराज, तथा कुल्लूकभट्ट और यञवल्क्य स्मृति के टीकाकरण विश्वरूप , विज्ञानेश्वर , अपरार्क आदि है |ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में बंगाल के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज के प्रयासों से मनुस्मृति का अंग्रेजी में अनुवाद द जेन्टु कोड ( The Gentoo code ) नाम से किया गया |
महाकाव्य - रामायण पहली एवं दूसरी शताब्दी के समय संस्कृत भाषा में इसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी |इसमें मुख्यतः 6000 श्लोक थे जो कालान्तर में 12000 और फिर 24000 हो गए |यह महाकाव्य - बालका्ड , अयोधयाकाण्ड अरण्यकाण्ड , किष्किन्धाकाण्ड , सुन्दरकाण्ड ,युध्य कांड ,एवं उत्रकाण्डामक सात कन्डो में बंटा हुआ है |
महाभारत - महाभारत की रचना ई.पू.चौथी शताब्दी में महर्षि व्यास ने की थी |महाभारत में मूलतः 8800 श्लोक थे जिसे जसंहिता कहा जाता है |श्लोको की संख्या 24000 होने पर यह भारत कहलाया |गुप्त काल में श्लोको की संख्या एक लाख होने पर यह शतसहस्री या महाभारत कहलाया
पुराण - प्राचीन आख्यानों से युक्त ग्रन्थ को पुराण कहा जाता है |संभवतः पाी सदी ई.पू. से चौथी शताब्दी ई.तक पुराण अस्तित्व में आ चुके थे |पुराणों की कुल संख्या 18 है| जिसमे विष्णु , मत्स्य , वायु ,ब्रह्माण्ड , तथा भगवत पुराण सरवाधिक ऐति महत्त्व के है क्योंकि इनमे राजाओ की वंशावली पाई जाती है |18 पुराणों में सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रमाणिक मतस्य पुराण है| इसमें सातवाहन वंश की जानकारी मिलती है |विष्णु पुराण से मौर्य वंश तथा वायु पुराण से गुप्त वंश की जानकारी मिलती है |अग्नि पुराण में तांत्रिक पद्धति का उल्लेख मिलता है |इसमें गणेश पूजा का प्रथम बार उल्लेख मिलता है |अठारह पुराण निम्न है - ब्रहा , पदम् , विष्णु , शिव , भगवत , नारद , मार्कण्डेय , अग्नि , भविष्य , ब्रहावैवर्त , लिंग , वराह , स्कन्द , वामन कूर्म , मतस्य , गरुड़ , ब्रह्माण्ड , |ऐतिहासिक कथाओ का सबसे अच्छा क्रमबद्ध विवरण पुराणों में मिलता है |
बौद्ध साहित्य - बौद्ध साहित्य के दो प्रमुख भाग है - जातक तथा पिटक |जातक कथाएं बुध के पूर्व जन्मो का कथानक वृतान है जिसमे प्राचीन भारतीय समाज की प्रवृतिओ का दिग्दर्शन होता है |जातककथाएं ई. पू. पांचवी सदी से दूसरी सदी तक की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर बहुमूल्य प्रकपर डालती है |सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ त्रिपिटक है जिसकी रचना बुद्ध के निर्वाण प्राप्त करने के बाद हुई |त्रिपिटक की भाषा पाली है |की संख्या तीन है - ये है सुत्तपिटक
सुत्तपिटक , विनयपिटक , एवं अभिधमपिटक| त्रिपिटक में इसा से पूर्व की शताब्दियों में भारत के सामाजिक एवं धार्मिक जीवन पर प्रकाश डाला गया हैं|
अभिधम्मपिटक में बुद्ध की शिक्षा का दार्शनिक विवेचन है |इस पिटक से संबंधित सात ग्रन्थ है जिसमे कथावस्तु सबसे महत्वपूर्ण है |
जैन साहित्य - प्राचीनतम जैन ग्रन्थ पूर्व कहे जाते है |इसमें महावीर द्वारा प्रचारित सिद्धांत संगृहीत है |ईसकी रचना प्राकृभाषा में हुई है | जैन साहित्य में आगमो का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है जिसके अंतर्गत 12 अंग , 12 उपांग , 10 प्मारकीर्ण प्रकीर्ण तथा 6 छंद सूत्रों को शामिल किया गया है |आगम ग्रंथो की रचना संभवतः शवेताम्बर सम्प्रदाय के आारा की गई है | जैन साहित्य में भी पुराणों का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है जिन्हे चरित कहा जाता है |ये प्राकृत , संस्कृत , तथा अपभ्रंश तीनो भाषाओ में लिखे गए है |
(2) धर्मेतर साहित्य -
धर्मेतर साहय के अंतर्गत ऐतिहासिक एवं अर्ध ऐतिहासिक ग्रंथो का तथा जीवनिओ का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है |
पाणिनि के अष्टाध्यायी से जो की एक व्याकरण ग्रन्थ है , पांचवी शताब्दी ई. पू. के समाज का विशिष्ट वर्णण है |
कौटिल्य के अर्थशास्त्र से मौर्य शासन के आदर्श और पद्धति का पता चलता है |
पतंजलि के माभाष्य और कालिदास के मालविकांग्निमित्र मालविकांग्निमित्र नामक नाटक से शुंगवंश के इतिहास परप्रकाश पड़ता है | कालिदास के रघुवंशम में समुद्रगुप्त की दिग्विजय तथा सोमदेव के कथासरित्सागर एवं क्षेमेन्द्र कृत वृहत्कथामञ्जरी में विक्रमादित्य की कुछ परम्पराओं का उल्लेख मिलता है |
बाणभट्ट कृत कृत हर्षचरित में हर्ष की उपलब्धिओं का , वाकपति के गौड़वहो मै कनौज के शासक यशोवर्मर विल्हण के विक्रमंकदेवचरित में कल्याणी के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य षष्ट की उपलब्धिं का वर्णण मिलता है |
संध्याकरनन्दी के रामचरित में पाल शासक रामपाल , हेमन्द्र के द्वयाश्रय काव्य में गुजरात के शासक कुमारपाल , पदमगुप्त के नवसाहसांकचरित में परमार वंश तथा जननायक के पृथ्वीराज विजय में पृथ्वीराज चौहान की उपलब्धिओं का वर्णन मिलता है |
कल्हण की पुस्तक राजतरंगिणी , भारतीय इतिहास का पहला प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रन्थ है |यह 12वी सदी में लिखा गया है|
दक्षिण भारत का प्रारंभिक इतिहास संगम साहित्य से ज्ञात होता है |संगम साहित्य मूल रूप से तमिल तथा तथा संस्कृत भाषा में रचित है |
(3) विदेशी विवरण -
विदेशिओ के वृतांत भी साहित्यिक साक्ष्य है विदेशी लेखकों की धर्मेतर घटनाओ में विशेष विशेष रूचि थी |विदेशिओ के वृतांत का विवेचन का वर्णन तीन वर्गों में किया जा है -
यूनान और रोम के लेखक ,
चीन के लेखक तथा
अरब के लेखक |
यूनान और रोम के लेखक - यूनान और रोम के लेखक में सबसे प्राचीन हेरोडोटस और टीसियस के वृतान्त है | हेरोडोटस को इतिहास का पिता कहा जाता है | जिसने पांचवी शताब्दी ई. पू. में हिस्टोरिका नामक पुस्तक की रचना की |
इसमें भारत और फारस फारस के बिच संबंधो का वर्णन किया गया है |टीसियस ईरानी राजवैध था |
सिकंदर के साथ भारत आये यूनानी लेखकों में निर्याकस , अ नासिक्रेटस अनासिक्रेट्स , अरिस्टोबुलस ,के विवरण प्रमुख है ,| अरिस्टोबुलस ने हिस्ट्री ऑफ़ द वॉर ( history of the war ) अनासिक्रेट्स ने सिकंदर की जीवनी लिखी |सिकंदर के बाद के लेखकों में तीन राजदूत - मेगस्थनीज , डायमेकस , और डाइनोसियस के नाम उल्लेखनीय है | मेगस्थनीज ने अपनी रचना इण्डिका में मौर्य प्रशासन , समाज तथा संस्कृति का विवरण दिया है |लैटिन भाषा में लिखित प्लिनी की नेचुरल हिस्टोरिका से भारतीय पशुओ , पौधों और खनिज पदार्थो के आलावा भारत और इटली के बिच होने वाले व्यापर की भी जानकारी मिलती है |
चीनी यात्रिओ के वृतान्त -
चीनी यात्रिओ में ह्वेनसांग ह्वेनसाँग , फाहान एवं इत्सिंग के विवरण महत्वपूर्ण है |
अरब यात्रिओ के वृतांत -
आठवीं शताब्दी से अरब लेखकों ने भारत के विषय में लिखना शुरू कर दिया था |नौवीं सदी के मध्य में भारत आये सुलेमान ने पाल एवं प्रतिहार राजाओ के विषय में विवरण प्रस्तुत किया है |अलबरूनी की रचना तहकीके हिन्द में गुप्तोत्तर काल के समाज का विविधता पूर्ण मिलता है |